Sunday, 6 September 2026

कल्पनाओं पर आधारित इंसान



इंसान कल्पना करने वाला जीव है। मनुष्य जीवन के प्रारंभिक भाग में कल्पना का अनुभव मेरे मस्तिष्क में भी हुआ जब मैंने गौतम बुद्ध की कहानी पढ़ी। उस वक़्त मुझे दुःख के कारण व उनकी एक पैर पर बारह वर्ष की तपस्या का बोध न हो सका। अपने पैरों पर खड़े होने के प्रयास किए किन्तु पाँच मिनट भी ऐसा कर सकने में मैं असमर्थ रही जिस कारण ऐसी कल्पना को उसी वक़्त मेरे मस्तिष्क ने ठुकरा दिया । ये यथार्थ में कल्पना को जोड़कर महिमामंडन रहा हो। परंतु एक बात ने मुझे हमेशा उदास करती वो ये कि हम बूढ़े होकर क्यों मर जाते हैं? इस पर मैंने अपने कुछ अध्यापकों से कई बार ये प्रश्न किया कि हम लोग पढ़ाई क्यों करते हैं? हमें क्यों कुछ बनना ज़रूरी है? सभी लोग तो आखिर में मर जाएंगे... फिर क्यों? कोई मेरी बात का संतोषजनक जवाब नहीं दे सका । फिर एक दिन लेखक रमेश गुप्ता की जीव विज्ञान की किताब में बुढ़ापे के जीन को किसी दवा से प्रयोग के बारे में पढ़ा। मेरी कल्पना ने एक कल्पित बात पर संतोष कर लिया। याने कल्पना ने गौतम बुद्ध को लेखबद्ध करने वाले इंसान से मेरे मस्तिष्क तक उड़ान भरी। ऐसी हज़ारों कल्पनाओं को हम सदियों से हम स्थानांतरित कर रहे हैं । दिमाग़ की एक सीमित क्षमता है उससे अधिक संग्रह करने के लिए विभिन्न माध्यम हैं। इसीलिए काम को विभाजित किया गया है...आयुर्वेदिक डॉक्टर को वायुयान बनाने वाले इंजीनियर से क्या वास्ता? सब लोग अपने अनुसार काम भी चुनते हैं। कविता व कहानियाँ भी कल्पित विधाएं हैं। आसमान के स्थापित ग्रह किसी ग्रंथ के नायक रह चुके हैं....करोड़ो कल्पनाओं के बाद अब परिवर्तित हो रहे नवयुग की कल्पनाएँ भी पुरानी कल्पनाओं में शामिल होंगी और नए बोझ कल्पनाओं के गट्ठर में रख दिए जाएंगे।


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कल्पना के आधार भिन्न हो सकते है। इन्हीं कल्पनाओं के आधार पर मत स्थापित होते हैं व विभिन्न व्यक्तित्व बनते हैं। संसार के सारे नियम इंसान द्वारा फलित हुए । सही या गलत के आधार भी इंसानी कल्पना पर निर्भर रहे हैं। इंसान ने अदियुग से बहुत सी सभ्यताओं को मिटते देखा , बहुत से नरसंहार देखे,अविष्कारों की बयार में परमाणु युद्ध देखे...और फिर इंसानी दिमाग़ यह सोचने के काबिल हो गया कि हम एक दूसरे को मिटाकर नहीं जी सकते जिसके कारण दिमागी चपलताएँ अधिक विकसित होती गयी और हम बिन उद्देश्य जीते रहे। इंसान के जीवन का उद्देश्य क्या है? ये भगीरथ प्रश्न बना रहा।


आशावाद या निराशावाद की कल्पनाएं जीवों में हार्मोन उद्दीपन के अतिरिक्त महत्व नहीं रखती। उद्दीपन से उत्साह का भाव बनता है और जीवन की सजीवता महसूस होती है। अब आप मनन कीजिए... कल्पनाओं के आधार पर अपनी मन्नतें मांगने हेतु एक प्रतिमा अथवा चित्र भी संतोषप्रद हो सकता है किन्तु ऐसी कपोल कल्पनाओं की उड़ान से क्या कुछ प्राप्त होने वाला है? भारत मे धर्म के आधार पर कल्पनाओं का अस्तित्व अधिक स्वीकार्य है। इसरो से लेकर कतिपय महान लोगों द्वारा धर्म आचरण किया जाता रहा है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्म जीवन शैली को उद्घृत न कर धार्मिक उन्मादता को संतृप्त करता है।

मानव जीवन की कोई भी कल्पना का हासिल क्या है? सिंधु सभ्यता जैसी उन्नत संरचनाएं भी कल्पना की अप्रतिम उपलब्धि रहीं हैं,जो काल के ग्रास में समाती रही। कितनी ही भाषाएं, बोलियाँ जो पीढ़ियों तक मौखिक एवं लिखित रूप में बसी रही ,वो भी विलुप्त हो गयी और खुदाई करने वाले हाथों में आकर भव्य रही वस्तुएं अपनी  स्थिति पर अश्रु बहाती रही।


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मिट्टी की पट्टिका पर हाथ से आकृति बनाने वाले अब हाथों से स्क्रीन पर लिख रहे हैं...कलम अपने आप में ग़ुम सी गयी है। कितनी विलक्षण सी बात है कि हममें से कुछ लोग समाज में अपने अनुभव के आधार पर धारणाएं स्थापित करते हैं। निश्चित हीअधिकतर आधार कल्पित ही हैं। इन्हीं कल्पित धारणाओं पर अधिकतर मनुष्य विश्वास करते हैं क्योंकि विश्वास करने वाले अपने अपने स्वभाव के मुताबिक ऐसा करते हैं। विश्व स्थापित धारणा के अनुसार सूर्य पूर्व से उदित होता है.....पूर्व शब्द एक दिशा है जो अग्रज मानव के द्वारा स्थापित की। ग्लोब पर अपनी अपनी स्थिति के अनुसार उदय और अस्त की मान्यताएं हैं। यहाँ तक कि ग्लोब के शीर्ष देशों में भी इन्हीं कल्पित दिशाओं का नाम समय के अनुसार निर्धारित है जबकि वहाँ छह माह दिवस व छह माह रात्रि की बात की जाती है। साधारण से शब्दों में कहा जाए तो मनुष्य की असीम विचारण क्षमताओं के कारण कई मान्यताएं पूर्ण ग्लोब में स्थापित हुई हैं।


हम अपने इस अनुभव को लिख लिख कर पीढ़ियों में समाहित करते रहे। निश्चित ही ऐसे कई कल्पित अनुभव रहे होंगे जो सभ्यताओं की तरह विलुप्त हो गए। इंसान पुनर्जन्म व आंकिक गणना आधारित कल्पित वस्तुओं से भी संचालित है किन्तु जीव विज्ञान प्रयोग बताते हैं कि हमारे हाथ की रेखाएं समान नहीं होती और न ही हमारे दिमाग़..... साधारण शब्दों में कहा जाए तो कोशिकाओं के विभिन्न विन्यासों से विभिन्न काया बनती हैं ऐसा भी संभव है कि अफ्रीका महाद्वीप की मसाई जनजाति में पैदा हुई सिल्विया नामक लड़की की कोशिकाएं अमेरिका के फिलाडेल्फिया में पैदा हुए जोसफ से मिलती हो....किन्तु इंसानी कल्पना इसे कोशिकाओं के विज्ञान से इतर दैवीय आधारों पर स्थापित करती रही।


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बचपन में दीवारों पर लगते हुए चित्रों में सजे धजे स्त्री पुरुष को दिखाते हुए बताया जाता है कि ये अमुक देवी या देवता हैं। बचपन एक ऐसी मिट्टी है जिसे किसी भी आकृति में परिवर्तित किया जा सकता है। कभी-कभी मेरा मन विचार करता है कि यदि मुझे देवी व देवता के नाम, उनकी कहानियाँ न सुनाई जाती तो मुझे ऐसे काल्पनिक पात्र कैसे पता चलते? धार्मिक कल्पनाएँ स्थायी हैं जिनमें किसी प्रकार का संशोधन नहीं किया जा सकता किन्तु  अन्य कथाओं इसमें जोड़ जटिल बनाया जा सकता है। धर्म के संविधान जैसी पुस्तकों के आधार पर समाज में पुरुष का वर्चस्व स्थापित है। 


हो सकता है ये कल्पनाएँ तत्समय मानव हित में रही हों , किन्तु 'धार्मिक संविधानों' में वर्तमान में यह प्रासंगिक नहीं दिखाई देती। धार्मिक संविधानों से ऊपर संविधान की कल्पना हमें मानव के रूप में स्थापित तो करती है किंतु फ्रांसीसी क्रांति के बाद अभी और कितनी क्रांतियाँ काल के गर्भ में हैं ये जानने के लिए हम जीवित ही कहाँ रहेंगें... लेकिन आत्मा की कल्पना को कागज़ व संचार साधनों में लेखबद्ध करने वाली विधा आगामी पीढ़ियों तक रहेगी। चूँकि एक बार की गई कल्पना को दोबारा कल्पित कर दोहराव की स्थिति से बचने हेतु इंसान अपनी-अपनी दिमाग़ की कोशिकाओं के स्पंदनों को लेखन के आधार पर पीढ़ियों तक परिवर्तित करता रहेगा । ये लुप्त हो चुकी सभ्यताएं जो छोटी छोटी संस्कृतियों के भव्य स्वरूप को दर्शाती हैं वो धरती की परतों का निर्माण करती रहेंगी जब तक कि विभिन्न कारणों से ढह चुकी सभ्यताओं को भविष्य के पुरातत्ववेत्ता अवशेषों, लिपियों या भाषाओं में न खोजे। 

Friday, 3 July 2026

आदिरंग (श्रीरंगम)



नवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के अंतिम चरण में स्थापित वैष्णव मंदिर में ये मेरी वो तस्वीर है जो श्रीरंगम के रंगनाथस्वामी मंदिर के प्रवेश द्वार की तरह एक छत के ऊपर खींची गई है। मेरे मन में उसी काल खंड की तस्वीर उभरती है जब शैव एवं वैष्णव संप्रदाय अपने-अपने धार्मिक विरोध के कारण पूजा स्थलों की स्थापना करने में लगा था। यदि मैं उस समय का प्रत्यक्ष दर्शन बन जाऊं तो शायद मेरी जीवन शैली के ढांचे में मैं भी विष्णु आराधक के साथ रहूं। हालाँकि बृहदेश्वर और श्रीरंगम की कलात्मक विशेषताएँ एक-दूसरी सामने की प्रतियोगिता में शामिल नहीं हैं, जो अपने अतीत के विहंगम और वैज्ञानिक निर्माण शैली को वर्तमान में शालीनता से स्थापित करती हैं। शैव वैष्णव के विभिन्न आधार हो सकते हैं। फरवरी का महीना है और इस सूरज का नज़ारा एक नमूना लड़का की तरह मुझसे घूमने आ रहा है। मान लीजिए कि उसे भी अपने सात रंग में से सफेद शफ़ाक रंग से अधिक जोड़ा गया है, वैसे ही वो मेरी उपस्थिति से जुड़ा हुआ है। केस खुला पाना भी मुश्किल लग रहा है। ये रोशनी इस छत पर सदियों से आ रही है तो अधिकार तो सूरज का ही है। इन पौराणिक कथाओं के अर्थ को देखने के लिए सूरज भी जरूरी है।


भगवान रंगनाथर और रंगनायकी हिंदू धर्म के श्री विष्णु और देवी लक्ष्मी के प्रिय हैं। गर्भगृह बेहद छोटा है जिसमें रंगनाथ स्वामी दक्खिन की ओर लंका को देख रहे हैं। राम के प्रतिरूप को भी इसी तरह देखा जाता है, जिसकी एक कहानी है। किसी भी पौराणिक कथा को दूर कर सकते हैं तो इस मंदिर के शिष्यों का स्वरूप आपके अंदर एक विशिष्ट संरचना है। मंदिर में कुल इक्कीस गोपुरम हैं, जिनमें से राजा गोपुरम 72 मीटर ऊंचे हैं। दक्षिण की गंगा 'कावेरी' और उसकी सहायक धारा 'कोलाइडम' द्वारा निर्मित द्वीप पर विराजित इस मंदिर में हरेक मीनार की पहचान बने हुए मंदिर का प्रहरी होना बताया गया है। इस छत के निकट प्रवेश द्वार से एक अन्य रंग का गोपुरम वेलई गोपुरम में दिखाई दे रहा है, जिसे कोई भी रंग समझने वाले रंग में नहीं डाला गया है। स्त्री की पहचान इसे गुप्त रखा गया है, वह हिंदू देवदासी थी या फिर अमीर कफूर की बेटी सुरथानी....इसके बारे में विद्वान में जो कट्टर रह रहे हैं। भगवान रंगनाथर के मुख्य मंदिर की स्थिति बायीं ओर एक स्त्री का मंदिर है। जो भी हो वैज्ञानिक रंगनाथर की प्रेयसी की पत्नी के रूप में स्वीकार किए गए तत्सम नामांकन और राजनीतिक निर्णय से प्रभावित हो सकते हैं। 


       इस मंदिर को भूलोक बैकुंठ कहा जाता है। वैष्णव संत रामानुजाचार्य की समाधि मंदिर परिसर में होना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उनके लिए भी ये स्थान आध्यात्मिक ज्ञान का स्थान रहा होगा। अलवार संतों द्वारा इसका महत्व होने के कारण 108 ' दिव्य देशम ' में प्रथम स्थान की मान्यता है।चोल साम्राज्य की किसी शाखा के शासक द्वारा द्रविड़ शैली में इस मंदिर की स्थापना की गई है। उत्तरोत्तर आने वाले शासकों ने इसके महत्व को विस्तारित किया । अधिकांश दक्खिन के मंदिरों की विशिष्ट बात ये है कि किसी भी स्थानिक शासक वर्ग के परिवर्तन ने मंदिरों की मौलिक पहचान से खिलवाड़ नहीं किया। जलकुंड मंदिर मंडपम से सुसज्जित परिसर एक किले की तरह दिखाई देता है जिसमें सात घेरों में दीवारें एवं गोपुरम विस्तारित है, जिन्हें मथिल सुवर,परकोटा या प्रकाराम कहते हैं।हर प्रकारम अपने भीतर अलग-अलग देवी-देवताओं , तीर्थ, मठ और बाजार सजाता है।अयिरम काल मंडपम (1000 स्तंभों वाला मंडप) अपने आपमें विहंगमता के दर्श देता है। ये शहर एक किलेनुमा संरचना है, जा आक्रमणों एवं आधिपत्य का द्योतक रहा है। समस्त गोपुरम इस मंदिर की पहचान हैं किंतु राजा गोपुरम सनातनी परंपराओं में एशिया में विशिष्ट है। इसका निर्माण राजा कृष्णदेव राय द्वारा सोलहवीं शताब्दी में प्रारंभ करवाया गया और इसे समग्र रूप से 1987 में पूर्ण किया गया। ये अबोले नक्काशियों में तराशे पत्थर यदि बोल सकते तो कितने बरसों के इतिहास के प्रत्यक्ष गवाह होते।  चोल, पांड्य, नायक और विजयनगर साम्राज्य के स्मृति चिह्न इन्हीं पत्थरों में साँस लेते हैं। 


सूर्य किरणों के रंग श्वेत हों या अपवर्तन के VIBGYOR को विज्ञान ने स्थापित किया हो, लेकिन परावर्तन एवं प्रकीर्णन के वास्तविक दृश्य अनुभव से गोपुरम का सफ़ेद रंग उस स्त्री की विशिष्टता एवं पवित्रता का प्रमाण है, जिसने इस शिखर से जान गंवा दी । ये बात भी विशेष महत्व की है कि स्थानिक लोगों द्वारा किसी देवदासी या अन्य धर्म की स्त्री को हमेशा के लिए श्री रंगनाथर के वाम दिशा में स्थान दिया गया। श्रीरंग का रंग श्याम है किंतु वेल्लाई गोपुरम का श्वेत......ऐसे विरोध रंग भी पवित्र प्रेम का प्रमाण माने जा सकते हैं।

*श्रीरंगम