Friday, 3 July 2026

आदिरंग (श्रीरंगम)



नवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के अंतिम चरण में स्थापित वैष्णव मंदिर में ये मेरी वो तस्वीर है जो श्रीरंगम के रंगनाथस्वामी मंदिर के प्रवेश द्वार की तरह एक छत के ऊपर खींची गई है। मेरे मन में उसी काल खंड की तस्वीर उभरती है जब शैव एवं वैष्णव संप्रदाय अपने-अपने धार्मिक विरोध के कारण पूजा स्थलों की स्थापना करने में लगा था। यदि मैं उस समय का प्रत्यक्ष दर्शन बन जाऊं तो शायद मेरी जीवन शैली के ढांचे में मैं भी विष्णु आराधक के साथ रहूं। हालाँकि बृहदेश्वर और श्रीरंगम की कलात्मक विशेषताएँ एक-दूसरी सामने की प्रतियोगिता में शामिल नहीं हैं, जो अपने अतीत के विहंगम और वैज्ञानिक निर्माण शैली को वर्तमान में शालीनता से स्थापित करती हैं। शैव वैष्णव के विभिन्न आधार हो सकते हैं। फरवरी का महीना है और इस सूरज का नज़ारा एक नमूना लड़का की तरह मुझसे घूमने आ रहा है। मान लीजिए कि उसे भी अपने सात रंग में से सफेद शफ़ाक रंग से अधिक जोड़ा गया है, वैसे ही वो मेरी उपस्थिति से जुड़ा हुआ है। केस खुला पाना भी मुश्किल लग रहा है। ये रोशनी इस छत पर सदियों से आ रही है तो अधिकार तो सूरज का ही है। इन पौराणिक कथाओं के अर्थ को देखने के लिए सूरज भी जरूरी है।


भगवान रंगनाथर और रंगनायकी हिंदू धर्म के श्री विष्णु और देवी लक्ष्मी के प्रिय हैं। गर्भगृह बेहद छोटा है जिसमें रंगनाथ स्वामी दक्खिन की ओर लंका को देख रहे हैं। राम के प्रतिरूप को भी इसी तरह देखा जाता है, जिसकी एक कहानी है। किसी भी पौराणिक कथा को दूर कर सकते हैं तो इस मंदिर के शिष्यों का स्वरूप आपके अंदर एक विशिष्ट संरचना है। मंदिर में कुल इक्कीस गोपुरम हैं, जिनमें से राजा गोपुरम 72 मीटर ऊंचे हैं। दक्षिण की गंगा 'कावेरी' और उसकी सहायक धारा 'कोलाइडम' द्वारा निर्मित द्वीप पर विराजित इस मंदिर में हरेक मीनार की पहचान बने हुए मंदिर का प्रहरी होना बताया गया है। इस छत के निकट प्रवेश द्वार से एक अन्य रंग का गोपुरम वेलई गोपुरम में दिखाई दे रहा है, जिसे कोई भी रंग समझने वाले रंग में नहीं डाला गया है। स्त्री की पहचान इसे गुप्त रखा गया है, वह हिंदू देवदासी थी या फिर अमीर कफूर की बेटी सुरथानी....इसके बारे में विद्वान में जो कट्टर रह रहे हैं। भगवान रंगनाथर के मुख्य मंदिर की स्थिति बायीं ओर एक स्त्री का मंदिर है। जो भी हो वैज्ञानिक रंगनाथर की प्रेयसी की पत्नी के रूप में स्वीकार किए गए तत्सम नामांकन और राजनीतिक निर्णय से प्रभावित हो सकते हैं। 


       इस मंदिर को भूलोक बैकुंठ कहा जाता है। वैष्णव संत रामानुजाचार्य की समाधि मंदिर परिसर में होना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उनके लिए भी ये स्थान आध्यात्मिक ज्ञान का स्थान रहा होगा। अलवार संतों द्वारा इसका महत्व होने के कारण 108 ' दिव्य देशम ' में प्रथम स्थान की मान्यता है।चोल साम्राज्य की किसी शाखा के शासक द्वारा द्रविड़ शैली में इस मंदिर की स्थापना की गई है। उत्तरोत्तर आने वाले शासकों ने इसके महत्व को विस्तारित किया । अधिकांश दक्खिन के मंदिरों की विशिष्ट बात ये है कि किसी भी स्थानिक शासक वर्ग के परिवर्तन ने मंदिरों की मौलिक पहचान से खिलवाड़ नहीं किया। जलकुंड मंदिर मंडपम से सुसज्जित परिसर एक किले की तरह दिखाई देता है जिसमें सात घेरों में दीवारें एवं गोपुरम विस्तारित है, जिन्हें मथिल सुवर,परकोटा या प्रकाराम कहते हैं।हर प्रकारम अपने भीतर अलग-अलग देवी-देवताओं , तीर्थ, मठ और बाजार सजाता है।अयिरम काल मंडपम (1000 स्तंभों वाला मंडप) अपने आपमें विहंगमता के दर्श देता है। ये शहर एक किलेनुमा संरचना है, जा आक्रमणों एवं आधिपत्य का द्योतक रहा है। समस्त गोपुरम इस मंदिर की पहचान हैं किंतु राजा गोपुरम सनातनी परंपराओं में एशिया में विशिष्ट है। इसका निर्माण राजा कृष्णदेव राय द्वारा सोलहवीं शताब्दी में प्रारंभ करवाया गया और इसे समग्र रूप से 1987 में पूर्ण किया गया। ये अबोले नक्काशियों में तराशे पत्थर यदि बोल सकते तो कितने बरसों के इतिहास के प्रत्यक्ष गवाह होते।  चोल, पांड्य, नायक और विजयनगर साम्राज्य के स्मृति चिह्न इन्हीं पत्थरों में साँस लेते हैं। 


सूर्य किरणों के रंग श्वेत हों या अपवर्तन के VIBGYOR को विज्ञान ने स्थापित किया हो, लेकिन परावर्तन एवं प्रकीर्णन के वास्तविक दृश्य अनुभव से गोपुरम का सफ़ेद रंग उस स्त्री की विशिष्टता एवं पवित्रता का प्रमाण है, जिसने इस शिखर से जान गंवा दी । ये बात भी विशेष महत्व की है कि स्थानिक लोगों द्वारा किसी देवदासी या अन्य धर्म की स्त्री को हमेशा के लिए श्री रंगनाथर के वाम दिशा में स्थान दिया गया। श्रीरंग का रंग श्याम है किंतु वेल्लाई गोपुरम का श्वेत......ऐसे विरोध रंग भी पवित्र प्रेम का प्रमाण माने जा सकते हैं।

*श्रीरंगम

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