Saturday, 30 May 2020

समय से आगे का समय


समय कभी नहीं रुकता ...न घड़ी में ...और न ही ज़िन्दगी में...। समय और ज़िन्दगी में एक फर्क होता है। समय पर उम्र की रेखाएं नहीं दिख पड़ती और ज़िन्दगी रेखाओं को जीकर दो ग़ज़ ज़मीन में समाती जाती है। समय की युवावस्था कभी ख़त्म नहीं होगी।वह मानव की उत्पत्ति से भी पूर्व बिग बैंग अवधारणा से समय से कितना जीवंत सा है। रामापिथेेकस , नियंडरथेलेंसिस जैसे कई मानवों के अवशेष हम इस समय की परिधि में खोल चुके है। अभी हम जैसे होमो सेपियंस के बाद जाने कौन सा जीव अवतरित हो। ये चिंता भी इंसान को कई पीढ़ियों के आगे ले जाएगी पर देखना ये समय जवां ही रहेगा। उस वक़्त चाहे ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया धधक रही हो या सम्पूर्ण पृथ्वी ब्रह्मांड के उस डरावने से ब्लैक होल में समा जाने वाली हो। मेरे और आपके जैसे करोड़ो दिमाग़ भी समय के आगे अपनी आहुति दे देंगे पर समय न ही आपके इस बलिदान से द्रवित होगा और न ही उसके माथे पर झुर्रियां पड़ेंगी । सोचिए तो ज़रा....जब सारी पृथ्वी जर्जर हो सकती है....तारे , ग्रह काल के गर्भ में समा सकते है ...तो समय क्यों नहीं मरता ?



कई मानवीय सभ्यताएं हमने खंगाली हैं। हम सभी अवशेषों में इतिहास को जमा कर देखते रहने के आदी हैं। हम अदृश्य कथनों पर धर्म के नाम पर विश्वास करने की तरह अपने आस पास की हवा को महसूस करते हैं । हम ही वो लोग हैं जो समय को अपने जन्म और मृत्यु से महसूस करते हैं । किन्तु ये भी सत्य है कि हम बस महसूस करने में ही माहिर हैं । इंसान का समय उसके छोटे से जीवन काल में बदलता है । शुरुवाती जीवन जानवरों की तरह रेंगकर चलता है फिर जब खड़ा होकर चलने लगता है तो वो खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने की भूल कर बैठता है। किसी समय उसे दो जून की रोटियाँ भी नहीं मिलती, और कभी जब कुबेर महाराज की कृपा उस पर होने लगती है तो बस फिर तो दुनिया आपके कद से छोटी बन जाती है। ये साधारण सा हाड़ मांस का मनुष्य अपने जीवन के एक समय को खुशमय बनाने के लिए काफी लंबा समय अध्ययन काल के लिए सुरक्षित रखता है,लिखता -पड़ता है, अच्छी नोकरी या व्यवसाय करने के लिए या कहें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए। जीवन को कर्मण्यशीलता से जीवंत रखने के लिए कितने ही लोगों ने सूक्त वाक्य लिखे परंतु मानव के जीवन का उद्देश्य मात्र कुछ वर्षों में सिमट कर कैसे रोचक रह सकता है।अपनी अपनी बौद्धिक क्षमताओं के आधार पर हर क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त होने के बाद मानव अपनी ढलती काया के खत्म होने का इंतज़ार करने को विवश हो जाता है। मानव के लिए बस यहीं तलक तो उद्देश्य है समय का फिर तो आत्म केंद्रित साध्यों की पूर्ति ही शेष रह जाती हैं।

       बरसों रामायण, महाभारत , पुराणों जैसे ग्रंथों से मनुष्य होने की योनि के प्रमाण इंसानी दिमाग ने स्वयं सिद्ध कर लिए । हिंदुओं की गीता ने आत्मा को अजर अमर घोषित किया। मुस्लिमों ने क़ुरान में स्वर्ग जाने की मेराज़ को बताया। ईश्वरवाद व अनीश्वरवाद की क्लिष्ट धरोहरों ने इसे अपने अपने तरीकों से और भी ज़्यादा व्याख्यात्मक कर डाला। हाय री इंसानियत ..जो हर काल निरंतर धराशायी होती रही और समय मानव की इस मूर्खता पर मंद मंद मुस्काता रहा , क्योंकि आदि व अंत में वो हो जीवित रहने वाला है जो एक अकाट्य सत्य है। 

ईसा मसीह के सलीब चढ़ने से समय ने बढ़ना शुरु किया।मानव जोड़ और घटाव के फेर तक ही सीमित रह गया। समय ने कितनी बार ग्रीन विच के वक़्त को भी धोखा दिया है...जाने कितनी बार समय के चार -चार सेकण्ड समय में समायोजित किए गए। मानव ने समय की पहेली को देशों में टाइम जोन में विभाजित किया किन्तु मानव समय को धोखा नहीं दे पाया।

मेरा मन भी कभी कभी बालक की हठ कर लेता है। मेरा दिल भावनाओं से भरता रहता है व दिमाग़ उन भावनाओं को पढ़ता है और मेरी ये कार्यशील उंगलियां मेरे  दिमाग को पढ़कर उसे पठनीय बनाती जाती हैं...है न  कंप्यूटर की गति से भी तेज़ , तो फिर समय की गति से आगे बढ़ उसे थामने में ये कुशलता कहाँ खो जाती है। पृथ्वी पर पाए जाने वाले प्रथम कोयसरवेट्स से होमोसेपियंस तक आ तो गए । कोई तो हो जो उस तेज़  समय के साथ दौड़ लगाने चले और उससे आगे निकल रोक ले उसे।

● सीमा बंगवाल

Thursday, 28 May 2020

विवाह के पौराणिक आधारों में स्त्री का अस्तित्व (भाग-1)


कहा जाता है कि विवाह सात जन्मों का बंधन है। दरअसल ये बात हमारे संस्कारों से हममें समाहित होती गयी व इसे सफल बनाए जाने हेतु सारे धार्मिक कर्मकांडो को इसके पक्ष में स्थापित कर दिया गया। किसी भी स्थापित संस्था की प्रासंगिकता तब होती है जब आत्मिक स्तर पर किसी भी विचार को हमारा मन आत्मसात कर लेता है। यदि विवाह की संकल्पना में आदर्शवाद की भावना होती तो भारत देश में व्याभिचार की घटनाएं बहुतायत से न होती। माँ ,बहिन,बेटी के नाम पर गालियाँ देने वाले देश मे स्त्री संवेदनशीलता का नितांत अभाव है। ये स्थिति आज भी विकट है । हमारे परिवार की स्त्रियॉं भी अपने अस्तिव को जाने बिना इस दुनिया से देह त्याग जाती हैं। हम लोग धर्म की बात करते है, नियमो की बात करते है ...स्त्री के बारे मे सोचते तक नहीं है। स्त्री के प्रति वस्तुभाव रखते हुए धर्म नियमों के साँचे में ढालकर मन मुताबिक व्यवहार करवाने के उद्देश्य से विवाह संस्था को निर्मित किया गया। हालाँकि इसके अपने गुण दोष हैं। दक्षिण व उत्तर भारतीय खण्डों में पुरातन काल से विवाह संस्था की भिन्न परंपराएं स्थापित हुई हैं।

1. उत्तर भारत में विवाह के पौराणिक आधार-
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कहा जाता है कि आर्य यूरोपीय अथवा मध्य एशिया(अधिक मान्य) से भारत के सप्त सैंधव प्रदेश में बसे । वह इंडो-यूरोपियन भाषाएं बोलते थे। 'आर्य' भाषायी संदर्भ में प्रासंगिक है । यह किसी नस्ल के लिए (हिटलर या हिंदू दक्षिणपंथी) प्रयुक्त नहीं है। ख़ैर आर्य आगमन के उपरांत की व्यवस्थाओं में भारतीय स्तर पर महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। यहाँ पर चूँकि एक विषय मात्र पर लिखा जाना अपेक्षित है, तो उसी केंद्र पर हम हज़ारों साल पहले के पन्नों का सफ़र करेंगे।

ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर कहा जाता है कि मानव चेतना ने दिमाग़ के विकास व आकार को सुदृढ़ किया एवं परिणामस्वरूप किए गए श्रम ने उसके हाथों को दक्ष किया। समूह, कबीले, सगोत्र ...आदि व्यवस्थाएं सामने आई। स्त्री विचार पर यदि देखें तो मिश्र सभ्यता में प्रथम देवी को सिंहनी के आकार में अंकित कर दर्शाया गया। हालाँकि विश्व स्तर की किन्हीं सभ्यताओं में स्त्री का बंधन नैसर्गिक रूप से संतानोत्पत्ति का ही रहा। पुरुष के वर्चस्ववादी समाज में वह एक वस्तु की भाँति प्रयुक्त की जाती गई। अब चूँकि मानवीय बौद्धिक क्षमताओं के उन्नयन का स्तर तत्कालीन परिस्थितियों में पुरुष व स्त्री के मानवीय मूल्यों की तार्किकता को परिभाषित करने में सक्षम नहीं था, इसीलिए स्त्री के प्रति ऐसा भाव रखा जाना भी प्राकृतिक ही कहा जा सकता है। स्त्री के प्राकृतिक कर्तव्यों में शिशु पालन पोषण होने से भी उसका घरेलू अस्तित्व प्रगाढ़ होता गया। हालांकि इन प्राकृतिक व्यवस्थाओं को अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता अपितु ये ही परंपराए ही कालांतर मे स्त्री के शारीरिक ; मानसिक व दैहिक अवनयन की आधारशिला रखने में सहायक सिद्ध हुई। 

शुरुवात में पुरुष या मातृ प्रधान जैसी कोई विचारधारा नहीं थी । यह एक प्राकृतिक रूप से गुजरने वाला जीवन था। जिसमें पुरुष व स्त्री भी अन्य जीव जंतुओं की तरह व्यवहार करते। ये न अच्छा था, न ही बुरा न नैतिक न अनैतिक। स्त्री को वस्तु की तरह देखने के कारण उसके साथ स्वतंत्र रूप से पशु-पक्षियों के समान यौनाचार करने की प्रवृत्ति रही और धीरे धीरे ये परंपरा का हिस्सा भी बनता गया। रामायण व महाभारत जैसी कथाओं में खीर खाने व देव आह्वान किए जाने से गर्भ धारण किया जाना भी उस समय स्त्री के प्रति ऐसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। ऋग्वैदिक काल व उसके बाद में रचित ग्रंथों में गौतम ऋषि के वंशज ऋषि आरुणि (उद्दालक)पुत्र श्वेतकेतु का वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि एक बार घर पर आए ऋषि की सेवा सुश्रुषा हेतु ऋषि आरुणि ने श्वेतकेतु की माता को आदेशित किया। अपनी माता को परपुरुष के साथ जाते देख श्वेतकेतु ने अपने पिता से इसका कारण जानना चाहा। ऋषि आरुणि द्वारा बताया गया कि "यह हमारी परंपराओं का हिस्सा है। स्त्री एक गाय की भाँति है और वह स्वतंत्र है।" उग्र व व्यथित श्वेतकेतु द्वारा पति व पत्नी हेतु पत्नीव्रत व पतिव्रत नियम बनाए गए एवं विवाह को धार्मिक आधार पर संस्थागत रूप से स्थापित किया गया।


एक अन्य मान्यता के आधार पर उत्तरी पांचाल की राजधानी कंपिला में पांचालों की परिषद हुई, जिसमें कई राज्यों के राजा, आर्यों व ब्राह्मणों के प्रतिनिधियों के साथ श्रोत्रिय भारद्वाज, शौनक, गौतम, जैमिनी, कणाद, वशिष्ठ, पाणिनि, औलूक जैसे कई धर्माचार्य भी सम्मिलित हुए। कई विद्वजन समझे जाने वाले लोगों के बीच विचार विमर्श के बाद निम्न मर्यादाएं/ नियम प्रतिपादित किए गए।

अथर्व आंगिरस ने प्रथम विवाह की मर्यादा स्थापित करते हुए युवती के वरण का अधिकार समाप्त करते हुए गृह कृत्यों व एक पति के साथ वृद्धावस्था तक कर्तव्य स्थापित कर दिए व स्त्री का दायभाग समाप्त करते हुए पुत्र के अधिकार सुनिश्चित करके उसे पुरुष के अधीन करने का विचार रखा। ऐतरेय ने पुरुष के द्वारा कई स्त्रियां रखे जाने का समर्थन किया व स्त्री को एक पति तक सीमित करने की बात पर बल दिया गया। सगोत्रीय विवाह निषेध करने का प्रस्ताव भी परिषद में रखा गया।

सोलह महाजनपद काल में स्त्री विहीन परिषद में पुरुषों के स्वार्थ ने उक्त प्रस्ताव को पारित करते हुए आर्य, अनार्य, अनुलोम, संकर सभी जातियों पर लागू करा दिया गया। देश के कई जनपदों यथा आंध्र, सौराष्ट्र, चोल, चेर, पाण्डेय, अंग, बंग, कलिंग सभी पर यह नियम लागू कर दिए गए। अनार्य को शुद्ध वर्ण से त्याज्य मान असवर्ण विवाह से उत्पन्न संतानों को दायभाग से वंचित कर दिया गया। इसके साथ ही अनुलोम व प्रतिलोम की पृथक जाति स्थापित कर दी गयी।

तत्पश्चात गौतम ऋषि द्वारा छः प्रकार के विवाह परिषद में घोषित किए गए। 
1. ब्रह्म विवाह(ब्राह्मण का ब्राह्मण के लिए), 
2.दैव विवाह(क्षत्रिय का ब्राह्मण के लिए), 
3.आर्ष विवाह(जनपद के लिए), 
4.गांधर्व विवाह(वयस्क वरण आधारित), 
5.क्षात्र विवाह(क्षत्रिय का क्षत्रिय के लिए),
6.मानुष विवाह(क्षत्रिय,ब्राह्मण का शूद्र के लिए)।

आपस्तम्ब ने उपरोक्त मर्यादा स्वीकार करते हुए क्षात्र विवाह को राक्षस और मानुष विवाह को आसुर घोषित किया। ऐसे विवाह भारत के दक्षिण भागों में प्रचलित हुए। वशिष्ठ द्वारा शुल्क दे ली गयी असुर कन्याओं व मोल ली गयी नीच जाति की कन्याओं (दासी) को विवाहित का दर्जा न देकर उनसे हुई संतानों के अधिकार
समाप्त कर दिए गए।

आपस्तम्ब द्वारा दैत्यों के आर्यकुल व देवकुल में विवाह संबंध होने के उदाहरण दिए गए। उन्होंने पुलोमा दैत्य की पुत्री शची इंद्र विवाह, वृषपर्वा की कन्या से ययाति के विवाह जैसे उदाहरण सबके सम्मुख प्रस्तुत किए और राक्षस एवं असुर विवाहों को आर्य परिपाटी अंतर्गत स्वीकृत करने की मांग की। तत्पश्चात गौतम द्वारा विवाह के छः प्रकारों को बढ़ाते हुए 

7.प्रजापत्य (कन्या के पिता द्वारा आदेशित)और 
8.पिशाच (बलात हरण)

प्रकार (कुल आठ) का समावेश किया गया। प्रश्नगत दोनों मूलतः विवाह नहीं थे किंतु कांबोजों को आर्य संघ में लाने हेतु उनकी परंपराओं को विवाह में शामिल कर लिया गया। आर्यों को अपने विरुद्ध षड्यंत्र न झेलने पड़े इस कारण भी यह अपरिहार्य था।

गौतम व आपस्तम्ब द्वारा माता व पिता की छः पीढ़ियों तक सगोत्र विवाह अमान्य घोषित किए गए। गौतम ने विवाह हेतु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र हेतु क्रमशः चार,तीन,दो,एक स्त्री की स्वीकृति दी व पुरुष के केवल अपने वर्ण की स्त्री से उत्पन्न संतति को ही पिता के शुद्ध वर्ण से होने के संपत्ति अधिकार दिए जाने की सहमति दर्शायी। अन्य संताने कुल सेवा हेतु प्रतिबद्ध की गई। इस प्रकार वैश्य व शूद्र में निम्न वर्ण रक्त अधिकायत से होने के कारण ये वर्ग हीन माने जाने के कथ्य स्थापित किए गए।

उक्त 'शुद्ध वर्ण' के अलावा निम्नलिखित जातीय संताने अस्तित्व में आई-
1. पारशव- ब्राह्मण पुरुष व शूद्र स्त्री से उत्पन्न संतान

2. अम्बट- ब्राह्मण पुरुष व वैश्य स्त्री से उत्पन्न संतान

3. उग्र- क्षत्रिय पुरुष व शूद्र स्त्री से उत्पन्न संतान

4. वैश्य- इनके द्वारा शूद्र स्त्री से उत्पन्न संतानों को वैश्य ही माना गया।

हालाँकि आपस्तम्ब द्वारा वर्णसंकर जातियों के अनेक प्रकार होने से आर्यों के विरुद्ध विद्रोह किए जाने की शंका की गई किन्तु गौतम द्वारा रक्त की शुद्धता को वरीयता में रखते हुए आर्य विवाह हेतु पाँच विधियाँ प्रतिपादित की।

क) अग्निप्रदक्षिणा,
ख) सप्तपदी लाजहोम,
ग) शिलारोहण,
घ) कन्यादान,
ङ्ग) गोत्रों का बचाव।

वशिष्ठ द्वारा क्षेत्रज पुत्र को दायभाग में द्वितीय स्थान दिए जाने का विचार रखा गया। विमर्श के बाद बोधायन के तृतीय स्थान पर क्षेत्रज हेतु दायभाग दिए जाने को संस्तुति की गई।

आपस्तम्ब द्वारा नियोग प्रथा पर आपत्ति की गई। गौतम द्वारा विधवा स्त्री को गुरु की आज्ञा से  देवर से ऋतुगमन की मर्यादा स्थापित की। देवर के अभाव में सपिण्ड, सगोत्र,समान प्रवर, स्वर्ण पुरुष से स्वीकार किया गया व दो बच्चों तक नियत किया गया।(ऋतुगम्य पुरुष का संतान पर अधिकार नहीं होता था।)

इसके अलावा किसी भी परिस्थिति में कर्मकांडीय विवाह होने तक कन्या माने जाने पर संस्तुति की गई (ताकि वस्तु समान स्त्री उपयोग करने के कारण सामाजिक ढांचे पर नकारात्मक प्रभाव न आए) एवम इन्हें भी भिन्न नाम दिए गए। मर्यादित पुरुष के प्रकार इस सभा में नहीं रखे गए किन्तु वशिष्ठ द्वारा छः प्रकार की कन्याएं घोषित की गई-

1.अक्षत अविवाहिता
2.क्षत अविवाहिता
3.अक्षत विवाहिता
4.साधारण स्त्री
5.विशिष्ट स्त्री
6.मुक्तभोगिनी

गौतम द्वारा पति के एकाएक बाहर देश जाने पर छः वर्ष प्रतीक्षा कर स्त्री को पुनर्विवाह किए जाने हेतु सहमति दी किन्तु पति के विद्या अध्धयन की स्थिति में ये अवधि बारह वर्षों तक मानी गयी।
कात्यायन द्वारा नपुंसक या पतित पति की स्त्री के दूसरे विवाह से उत्पन्न पुत्र (पौनर्भव) को प्रथम पति के दाय से भोजन वस्त्र के अधिकार दिए गए। वशिष्ठ द्वारा पुनर्भवा स्त्री व पौनर्भव स्त्री के मापदंड रखे गए। हारीत (औरस,क्षेत्रज,पौनर्भव,कानीन, पुत्रिकपुत्र और गूढज) को क्रम से दायभागी माना गया।

इस प्रकार भरे पुरुष समाज के स्त्रीविहीन दरबार में स्त्री के लिए नियम बनाए गए और स्त्रियों ने इसे स्वीकार कर कई युग पर कर लिए। 

जब भी नई परंपराओं व नियमों को समाज के ऊपर थोपा जाता है तो अधिकतर ये स्वीकार्य नहीं होता। लेकिन भारतीय स्तर पर धर्म के अतिरेक ने इसे कुछ स्वीकार्य बना दिया क्योंकि स्त्री को देवी बना शोषण करने वाले ऋषि मुनि साक्षात ईश्वर का पर्याय माने जाते थे। वेदों में भारद्वाज,विश्वामित्र, कश्यप,अगस्त्य जैसे कई ऋषियों का उल्लेख मिलता है, जो हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में स्वर्ग के राजा इंद्र एवं अप्सराओं के साथ सीधे संपर्क करते दिखते रहे हैं। आज इक्कीसवीं सदी में भी साधारण जनमानस में धर्म की अंधता के द्वारा सब कुछ स्वीकार कराया जा सकता है। 

विश्व के विभिन्न स्थानों पर धर्म का उद्देश्य तत्कालीन परिस्थितियों में जीवन शैली के नियम बनाने से प्रारंभ हुआ। वेद, बाइबिल, क़ुरआन मेरे नज़रिए से दैवीय/आसमानी किताबें नहीं हैं...किसी मनुष्य के द्वारा इनको धर्म के आवरण में संभवतः इसलिए जड़ा गया होगा ताकि लोगों के मन में भय उत्पन्न हो व वह सही आचरण कर सके, उस समय लोगों ने ये सही मार्ग समझा होगा किन्तु आज वैज्ञानिक युग की दैवीय सोच में ऐसे प्रयोग प्रासंगिक नहीं हो सकते । यह आरंभिक ग्रंथ साधन व साध्य दोनों की पवित्रता का प्रतीक है। इन ग्रंथों में मानववादी दृष्टिकोण कमोबेश एक सा है... किंतु धीरे धीरे धर्म के अंध प्रचारकों द्वारा द्वेष, भेदभाव के इतने खाके खींच डाले कि आज करोड़ो लोग इसका शिकार हो गए हैं। जिसका सबसे ज़्यादा दर्द स्त्रियों ने बर्दाश्त किया है।

● सीमा बंगवाल 
                                               क्रमशः   .......

Wednesday, 27 May 2020

आदिकाल से कोरोनाकाल तक उत्परिवर्तन के आयाम



आहार, निद्रा, भय (प्रतिवर्ती क्रियाएं) व मैथुन/परागण सजीव की नैसर्गिक प्रवृतियां हैं। मनुष्य उत्पत्ति के उपरांत सर्वप्रथम अनुभव के आधार पर खाद्य व अखाद्य आहार को वर्गीकृत किया गया। उसने अपनी दृष्टि अनुभवों से पशु को पशु का वध कर आहार बनते देखा होगा फिर उसकी बुद्धि ने मछली, छोटे जीवों से बड़े जीवों का शिकार कर आहार बनाया होगा। उस समय मांसाहार को चुनने व खाने में धार्मिक आधार नहीं था। संभवतः जिस जानवर की उपलब्धता अधिक या कम रही वह जानवर उस कबीले / मनुष्य का 'टोटेम'(गणचिह्न) बन गया होगा।



विश्व के सारे धर्मों से पूर्व आदिवासी संस्कृति व्याप्त थी जिसमें 'टोटेम' की अवधारणा थी जो धीरे धीरे सभ्यताओं व संस्कृतियों में समाती चली गयी। ये स्मृति चिह्नों के रूप में मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की सभ्यता में मुहरों, कलाकृतियों आदि के रूप अभिसारित हुई...मिस्र व मेसोपोटामिया के साथ ग्रीक व चीन सभ्यताओं में भी ऐसी समानता देखी गयी।

कालांतर में 'टोटेम' को विभिन्न धर्मों में कुलदेवता का दर्जा मिल गया। इसी प्रकार आदिवासियों में वृक्षों की उपयोगिता के आधार पर पीपल, बरगद, महुआ आदि को कुलवृक्ष का दर्जा मिला और वो कई आगामी कई  परंपराओं में पूजनीय हो गए।



धर्मों के स्थापन के उपरांत ये 'टोटेम' धर्म के अंदर समाहित किए गए। अधिकतर गणचिह्नों को सनातनी धर्म में भी पूजनीय माना गया है। सर्प नाग जाति का गण चिह्न था। अफ्रीका व युगांडा आदि देशों  में भी सर्प से कटवाकर न्याय किए जाने के उल्लेख मिलते हैं। इसी प्रकार मछली के रूप भी पूजनीय हुए। विष्णु का मत्स्य अवतार हो या फिर बंगाल में मछली की पवित्रता।
 मछली के सेवन को बंगाल व गोवा के ब्राह्मण परिवार शाकाहार मानते हैं। वैदिक काल की बात करें तो उस काल में बड़े दुधारू जानवरों को खाना वर्जित नहीं था। 

विश्व के विभिन्न भागों में उपलब्ध खाद्य के आधार पर जीवन शैलियां विभाजित हैं। फ्रांस जैसे देश में लगभग 1400 प्रकार के कीट खाए जाते हैं। विभिन्न धर्मों में बलि को भी मान्यतायें प्राप्त हैं कहीं वास्तविक व कहीं सांकेतिक। मक्का मदीना में ऊँट एवं ठण्डे प्रदेशों में याक आदि की बलि दी जाती है। वर्तमान में बलि हेतु मुर्गा, बकरा, भैंस आदि के साथ सांकेतिक रूप में नारियल, कद्दू के भी प्रमाण मिलते हैं। 
 

धरती बनने के बाद जीव जंतु व पेड़-पौधे कई प्रकार से प्रभावित हुए। 1984 में भोपाल गैस काण्ड में मनुष्यों के साथ ज़हरीली गैस मिथाइल आइसो साइनाइट से आस- पास के पौधे भी झुलस गए। हिरोशिमा व नागासाकी में मनुष्य, जानवर व पौधों में जेनेटिक उत्परिवर्तन(म्युटेशन) हुए। पृथ्वी पर ऐसे उत्परिवर्तन  चिरकाल से हो रहे हैं । यद्यपि अधिकाधिक कारणों के पीछे मानवजन्य विकास व कुंठाएँ है किंतु प्रकृति जन्य कारण को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।  

 ये पृथ्वी अनंत में सूर्य की परिक्रमा की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर घूर्णन कर रही है....सूर्य भी अनंत में स्थिर नहीं है वह भी जाने कितने दूरस्थ पिण्डों का चक्र पूर्ण करता होगा। पृथ्वी  जाने कितने अनंत में अपनी अवस्था से गुजरती होगी। पृथ्वी पर अमेज़ॉन और अफ्रीका के घने जंगल ग्लोबल वार्मिग को नहीं रोक पा रहे हैं .... अभी तक प्रकृति और मानव ने मिलकर ओज़ोन पर कितना कहर बरपाया है। प्रकृति तो सभ्यताओं को लीलकर दोबारा विकसित होने में सक्षम है किंतु मानव दोबारा विकसित नहीं हो सकता। 


मैंने 1945 के फेटमैन व लिटिल बॉय का कहर महसूस नहीं किया, साठ के दशक का अकाल नहीं देखा, भुखमरी नहीं देखी... गाँधी के समय प्लेग की महामारी भी नहीं लेकिन मैनें अभाव देखे, नफ़रतें देखी, अपमान देखे, ईर्ष्या देखी.....एंथ्रेक्स का खौफ़ दूर से जाना किन्तु आज कोरोना की वजह से प्रथम बार मृत्यु का भय व मानवता का अंत महसूस किया जो धर्म ,जाति, लिंग आदि किसी आधार पर विभेद नहीं करता। एक मामूली सा वायरस पूरे जगत को खत्म करने की क्षमता रखता है।  काफी इंसान मौत की नींद सो गए ओर काफी लोग मृत्यु की दहलीज़ पर खड़े हैं। हम लोग सैनिटाइजर व साफ सफाई पर केंद्रित हैं किंतु हम त्रासदियों से नहीं सीखते । कोरोना सबके प्रति समान व्यवहार रखता है ये तो उसका विशेष गुण है उसकी महानता है जो इंसान शायद ही सीखे । मरने व मारने के तो बहुत सारे तरीके हैं। हम लोग जो इस दुनिया मे शेष बचेंगे वो फिर इंसानों को बांटेंगे, नफ़रतों को पालेंगे। धरती की उर्वरता कब तक रहेगी? अपनी ही पृथ्वी से खनिज, तेल, अन्न सब कुछ तो छीन कर मैला करते रहे । 'हम लोग'....आसमान में इंसानी घुसपैठ से कितने वैज्ञानिक कचरे फैल गए । इन सभी विभिन्न मुद्दों के लिए इंसान होना ज़रूरी है।

   कोरोना से बचना व वैक्सीन बनाना एक अलग बात है किन्तु धरती की लहलहाती फसलें उर्वरकों के कारण कुछ क्षेत्रों तक सीमित हो गयी हैं और जनसंख्या आधिक्य वाले देश मांसाहार की और उन्मुख हुए हैं। कोरोना के कारण मांस मुफ़्त बंटने की कगार तक आ गए। मुर्गों के समस्त परिवार बेफिक्र हो सर उठा चलने लगे और हम लोग मास्क लगा घर में मृत्यु के भय को जीने को मजबूर...


मांसाहार कोई धार्मिक विरोध का कारण नहीं हो सकता...चुने हुए जानवरों के मांस खाना भी कोई आदर्श नहीं।  हम आपकी तरह जानवरों के शरीर के मांस में विभिन्न बीमारियां उत्पन्न हुई व मृत्यु का कारण बनी। मर्स , स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियों से भी हम बच गए किन्तु अब ये चिंतन का विषय है कि कितने काल से उत्परिवर्तन को अपनी कोशिकाओं में ढोते हुए जानवर के मांस बीमारी के वाहक तो नहीं या फिर हमारे शरीर मे किसी प्रकार के वायरस के प्रति एंटीबाडी बनाने में सक्षम तो नहीं हो रहे। हालाँकि शाक वर्ग में भी गुच्छी व मशरूम के अतिरिक्त कई प्रकार हैं जो कई उत्परिवर्तन के बाद आज ज़हरीले हैं। विडंबना है कि हम शाकाहार के प्रति तो इतने सजग हैं किंतु मांसाहार सिर्फ स्वाद व धार्मिक कवच के लिए करते हैं। 


ज़रूरत इस बात की है कि अपनी सोंच में इंसानियत को महत्व दे। हिन्दू व मुस्लिम लोग भविष्य के लिए अपना अच्छा इतिहास बनाए। हम सभी 'म्युटेटेड' लोग सब मिलकर म्युटेटेड मांस व म्युटेटेड शाक को खाने पर चिंतन करें। धरती को उर्वर और आसमान को फिर से साफ बनाए जाने की दिशा में प्रयत्नशील हो।

● सीमा बंगवाल

Monday, 25 May 2020

साहब,साहबियत और साहिबा....भाग -3



साहिबा.... साहिबा के ऊपर बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ हैं , ढेर से संस्कारों की रक्षक बनने की मजबूरी है। इनमें से बहुत कुछ जन्मजात प्रदत्त सामाजिक देन हैं। अब साहिबा आखिरकार है तो एक 'स्त्री' ही। 'स्त्री' जिसका जन्मजात आधार पर 'अधिकार' हनन कर उसे 'देवी' बना दिया जाता है और वो पुरातन काल से अपनी सामाजिक पहचान को ढोते हुए 'देवी' का रूप स्वेच्छा से स्वीकार भी कर लेती है । फिर भारत मे धर्म की प्रबलता मानव धर्म से श्रेष्ठ श्रेणी में रही है।



      ये समाज स्त्री को 'देवी' घोषित कर देता है किंतु 'पुरुष' को देवता बनाने में अक्षम रहा है। याने 'पुरुष' सिर्फ एक पुरुष है...और 'स्त्री' 'देवी' की दोहरी जिम्मेदारियों से अभिप्रेरित सर्वगुणसम्पन्न प्रतिमा........यद्यपि जो भी सामाजिक नियम बनाये गए वो स्त्री को वस्तुपरक रूप में रखकर बनाये गए। पीढ़ी दर पीढ़ी ये सोंच स्त्री के 'जीन' में समाहित हो चली और आज हर 'पुरुष' कहता है कि "स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है।" स्त्री को 'संपत्ति' बनाने की सोंच व उसका प्रभावी कर्म मौलिक स्तर पर पुरुषजन्य रहा और सदियों ऐसा करके अब ये ज़िम्मेदारी भी स्त्री को सौंप दी गयी। स्त्री में लंबे समय से ये जेनेटिक बदलाव इस प्रकार से हुआ जैसे सदियों सर्कस के जानवरों को अभ्यस्त बनाते बनाते एक दिन वो स्वतः ही वो जानवर अनुकूल व्यवहार करने लगते हैं। लेमार्क ने भी 'विकासवाद के सिद्धांत' में जीवन के कायिक लक्षणों या अर्जित गुणों का अगली पीढ़ी में संचरित होना बताया है । ये वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो या न हो ,किन्तु 'स्त्री' के लिए इसे पूर्णरूपेण सत्य कहा जा सकता है।

स्त्री जन्म उपरांत भी कई विचारधाराएं हैं। लड़की बदसूरत जन्मी तो भी समस्या। 'दिव्यांग' जन्मे तो भी समस्या...खूबसूरत जन्मे तो भी उत्साह कहीं सोया सा रहता है। यही स्त्रियाँ 'साहिबा' बनती है...कोई घर के अंदर ..और कोई कार्यक्षेत्रों में। अब 'साहिबा' चाहे कितने ही उच्च पद को क्यों न विराजे या अपने अस्तित्व को पारिवारिक जिम्मेदारियों और संस्कारों की सीमा में कैद करके बिन अधिकारों की 'मालकिन' बने, लेकिन उसका प्रखर होना माफ़ी योग्य नहीं होता..और यदि ये वर्ण व्यवस्था आधारित निरीह स्त्री हो तब तो समस्या और भी विकट हो जाती है। उसके कई सपने तो जन्मजात रूप से मार दिए जाते है। कमोबेश स्त्री होना लगभग एक सा ही है।

अब खूबसूरत 'साहिबा' हो तब तो 'साहिबा' अपने कार्यो से उल्लिखित नहीं की जाती । समाज का सभ्रांत व चरित्र कसौटी पर स्थापित रूप से खरा उतरने वाला 'पुरूष'  'साहिबा' को खूबसूरती के आधार पर कलंकित करने का हर संभव प्रयास भी करता है और यह प्रयास उसकी अकर्मण्यता का परिचायक अधिक है। हालाँकि 'स्त्री' के प्रति उसकी ऐसी सोंच दोषी नहीं है। 'पुरुष' जब अतीत साहित्य पढ़ता है तो 'स्त्री' के प्रति एक दैहिक व अधिकार योग्य वस्तु की सोंच रखता है और जब एक 'स्त्री' अपने सदियों के व्यवहार को देखती है तो इतने निम्न व्यवहार से उसका हृदय रुदित होता है लेकिन ये सब बातें 'साहिबा' अधिक बेहतर समझती है। भुक्तभोगी विश्लेषण ज़्यादा विश्वासपरक होता है।

अब भारतीय समाज मे लड़की के जन्म पर अक्सर उत्साह का माहौल नहीं आता। न कोई जनमासा होता न कोई जलसा...और भी बहुत .....लेकिन झूठे मुँह हम बड़ी मुश्किल से लोगों को कहते हैं कि "आजकल लड़के से बढ़िया लड़की है।" पता नहीं ......शायद सच भी हो लेकिन प्रत्यक्ष दर्शिता से ऐसा बेहद ही कम या न के बराबर ही होता है जहाँ मात्र एक या दो लड़कियों को ही बेहद अच्छी शिक्षा देकर काबिल बनाया गया हो। हमारे समाज में लिंगात्मक आधार पर ही भाग्य विश्लेषण घोषित कर दिया जाता है। कर्तव्य,संस्कार व ज़िम्मेदारियाँ लड़की के हिस्से आते हैं और लड़के को मिलते हैं जन्मजात अधिकार। अब लड़की , जो एक स्त्री है, वो सामाजिक रूप से काबिल भी बन जाये तो उन्हें बनना तो आखिरकार 'साहिबा' ही है। 'साहब' के विभिन्न स्वरूपों की अधिकारी 'साहिबा' हो भी तो भी 'अधिकार' को मानवरूपी गुणों के आधार पर बिन किसी पूर्वाग्रह के ये 'पुरुषप्रधान मानसिकता' की परंपराएं स्वीकार्यता की सकारात्मक सोंच नहीं रखती फिर इन परंपराओं की बेड़ियाँ किसी औज़ार से नहीं कट सकती।

हमारे सामने सदियों से बहुत से मुद्दे रहे। कभी धरती के क्षेत्र को हड़पना उद्देश्य रहा। कभी अर्थव्यवस्था के बदलाव पर परिवर्तन अनिवार्य से हुआ किन्तु स्त्री के प्रति कभी वस्तुजन्यता से ऊपर सोंच विकसित करने में हम असहाय रहे। कतिपय सेमेटिक परंपराओं में विधवा विवाह व स्त्री अधिकारों को 'आसमानी किताब' में लेखबद्ध भी किया। सनातनी परंपराएं, सती व जौहर प्रथा में स्त्री का शील स्थापित करने में गौरव अनुभूति करते रहे। आज के समाज के अनुरूप विश्लेषण करने में हम कतई कमतर नहीं हैं। किसी भी समाज मे जो लेखबद्ध हुआ , वो उस समय निश्चित तौर पर क्रांतिकारी विचार से प्रेरित कहा जा सकता है...उसके रूप अलग हो सकते हैं जैसे 'मुहम्मद' के समय का विधवा विवाह हो या 'चंद्रगुप्त' का गणिका सम्मान। सदियों बाद भी स्त्री 'विमर्श' के जाल में फंसी हुई मछली सी है और हज़ार कानून लेखबद्ध होने पर भी अधिकारों से वंचित व सामाजिक तिरस्कार की भोगिनी। लेखबद्ध आधार पर स्त्री उन्नति को विश्व पटल पर उत्कीर्ण नहीं किया जा सकता जब तक कि सामाजिक रूप से स्त्री के अस्तित्व को स्वीकार न कर लिया जाए।

एक ग़ुलामी भारत ने लंबे अरसे तलक झेली लेकिन कभी कभी मानसिक ग़ुलामी हमारे ज़हन से दूर नहीं हो पाती। वैसे ही 'साहिबा' के प्रति एक सामाजिक सोंच उसे असल तौर पर 'साहब' नहीं बना पाती।'साहिबा' में 'साहबियत के लाख गुण हों लेकिन 'साहिबा' एक स्त्री के प्रति एक पुरातनी सोंच से हार जाती है ओर जहाँ 'साहिबा' न हारे वहाँ हरा दी जाती है और 'किरण' साहब रूपी ज़िम्मेदारियों को अंततः छोड़ जाती है लेकिन इस स्वाभिमान से 'साहिबा' के प्रति सोंच कहाँ खत्म होती है?

'साहिबा' अपने जीवन की किसी बात से विचलित नहीं होती। यद्यपि वो साहिबा है, अपितु उसका मन , उसका दिमाग़ एक लंबे काल चरण से गुज़र कर एक मजबूत से खोल में समा चुका है। 'साहिबा' साहबियत में विश्व समुदाय से टक्कर लेकर पोखरण के विस्फोट कर सकती है। 'साहिबा' खूबसूरती में 'ब्रह्माण्ड सुंदरी' बन सकती है। अंतरिक्ष में रहने का रिकॉर्ड बना सकती है.... यही नहीं विश्व जगत की 'सेरेना' , 'सानिया' व 'संधू'बन सकती हैं, लेकिन 'साहब' की सहाबियत सिर्फ 'गुलज़ार' में समाहित नहीं होती...साहबियत साँसे लेती है हमारी सोंच में...तर्कहीन को तर्कशील बताते हुए।

● सीमा बंगवाल

Saturday, 23 May 2020

साहब, साहबियत और साहिबा- भाग 2

वैलेजली साहब का राज्य हड़प सिद्धान्त एकदम साहब की वर्चस्ववादी सोंच और कार्यप्रणाली से श्रेष्ठ उदाहरण रहा है। साहब के नाम की मर्यादा को वैलेजली ने धूमिल नहीं किया बल्कि भारतीय राजशाही को धूल चटा देने वाली इस साहबियत ने उसके नाम को भी रोशन किया। 1857 का विद्रोह न होता तो साहबियत का रूप और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता। हालाँकि कंपनी में  'साहिबा' कोहिनूर को अपने मुकुट में सजा चुकी थी। ये साहिबा वाक़ई साहब से ज़्यादा महत्वपूर्ण रही। अब साहिबा के वेश में साहिबा साहब ही तो थी। वरना देखिये अधिकृत देशों के नागरिकों को झुका उनकी गर्दन पर तलवार रखकर उपाधियाँ देना एक वर्चस्व की कहानी बयां करता है। भारतीय साहिबा के बारे में यदि देखा जाए तो रज़िया सुल्तान याद  आती है। लेकिन विश्व के विभिन्न परिवेशों में ब्रितानी साहिबा का स्थान ही सर्वोत्कृष्ट श्रेणी में रहा है ,क्योंकि उन्होनें साहबियत को स्वयं में धारित किया। रजिया साहिबा तो एक स्त्री ज़्यादा थी, साहबियत को समझने में थोड़ी चूक कर गयी और प्रेम कर बैठी, तुर्कानो से लड़ बैठी। उसकी हत्या कर दी गयी किन्तु साहबियत की साँसे ज़िंदा रही।





भारतीय मूल्यों में अनुसरण करना पहले सीखा जाता है। चूँकि हमारा इतिहास लंबे वक्त से विदेशी शासकों द्वारा शासित होता रहा, तो साहबियत का गुण कैसे पीछे रह जाता? साहब के गुण होने पर व्यक्ति का आत्मविश्वास दस गुना बढ़ जाता है। अब आप साहब बनने पर ही रिसर्च मत करने लगना , क्योंकि ये सिविल सर्विसेज की परीक्षा से भी कठिन है। पहले तो आप सफ़ल होंगे नहीं, लेकिन यदि आप सफ़ल हो गए ,तो आप कभी भी साहब के दर्ज़े से नीचे नहीं गिर सकते। साहबियत के लिए सिर्फ़ ऊंचाईयों पर पहुंचना ज़रूरी नहीं ... न इसके लिए कोई खास कद काठी का प्रावधान है और न ही किसी विशेष अंदाज़ का। लेकिन देखिये ये अंदाज़े बयाँ का कितना स्पष्ट उदाहरण है कि साहेब...साहिब...साहिबा। सारे शब्द 'साहब' के दूसरी और ही दिखते हैं। अब कुछ देर के लिए गुलज़ार 'साहब' को भूल जाइए। साहब की कल्पना करके मुझे राजशाही याद आ जाती है। 'राजा' और 'प्रजा'.....अब राजा भी ऋग्वैदिक काल की समानता से ऊपर उठकर अशोक के कलिंग विजय उपरांत निरंकुश पितृसत्तात्मक स्तर तक पहुंच ही गया था। रुहेला में इब्नबतूता की लिखावट सुल्तान की क्रूरता याद दिलाती है और फिर मेरा मन 1857 की क्रांति में ब्रिटिश अत्याचारों से भी रुदन करता है। कई संस्कृतियाँ मिट्टी में दफन हो गयी लेकिन ये साहबियत नहीं मरती। जाने कौन सा आब ए हयात पी कर साहबियत आयी है जो इंसान से बढ़कर खुद के वजूद पर इतराती है। अब साहबियत की सोहबत में रहे तब ही आब ए हयात की कुछ बूंदें मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

#ख़्याल_ए_साहिबा

Friday, 22 May 2020

साहब, साहबियत और साहिबा- भाग 1



'साहब' होना बड़े गर्व की बात होती है। 'साहब' बनने का पहला पायदान होता है अफ़सर होना लेकिन आप ज़ुबाँ से बोल कर देखिये तो 'साहब' में ज़्यादा वज़न लगता है।  'साहब' से मिलता जुलता एक अल्फ़ाज़ और है।'साहेब' जिसमें प्रेम, आदर की प्रबलता है। हालांकि 'साहेब' बहुत से लोग हो सकते हैं लेकिन 'साहेब' और 'साहब' में एक अंतर होता है । 'साहेब' का मान कमाकर मिलता है और 'साहब' का छीनकर। 'साहब' बनना भी सबके बस में नहीं।'साहब' बनने में विशिष्ट गुण अर्जित करने होते है, ये 'साहब' किसी भी प्रकार से ज़माने में कहीं भी 'साहब' बने लेकिन इनकी बात का समर्थन करने वाले कुछेक लोग इनके हृदयप्रिय होते हैं। जहाँ हृदय की प्रसन्नता का प्रश्न होता है वहाँ 'साहब' समझौता क्यों करे भला?
             

साहब की पहचान भी आसान सी होती है। जब आप साहब के समक्ष हों तो साहब फोन पर अपनी रौबदार प्रशंसा कर रहे होते है और शायद उनसे भी बड़े साहब से बात करते हुए आपको ये ज़रूर संकेत दे देते हैं कि वो बड़े ही विशिष्ट श्रेणी से ताल्लुक रखते है। वो आपको नज़रअंदाज़ करते हुए लम्बी बाते करेंगे और आपको बिन कहे जता देंगे कि आप 'सर्वहारा' के पर्याय हैं। साहब का हाड़ मास का शरीर काले कोट में छिपा हुआ सा रहता है। ओह्ह...अब इसमें ये जो काला रंग है उसकी भी अपनी खास विशेषता है। किसी भी रंग को अवशोषित करने की शक्ति उसे दूसरों से अलग पहचान देती है और ये विशिष्ट गुण भी साहब ही रखते हैं।खैर साहब होना खास है, ये तो अकाट्य सत्य है लेकिन साहब के परिवार का हिस्सा होना भी सौभाग्य की बात है क्योंकि साहब के पूर्ण संबंधियों को भी साहब की जेड श्रेणी के लाभ प्राप्त होते हैं या कहें कि साहब का पूर्ण परिवार भी साहब का ही द्वितीय रूप है, तो अतिशयोक्ति न होगी।

बड़ी बड़ी परीक्षाओं से आए ईमानदार अफसरों को भी साहब कुछ नहीं समझते। साधारण जनता तो बहुत दूर की बात है। वैसे एक तरह से साहब होने का ये गुण है अवगुण नहीं क्योंकि साहब की प्रतिष्ठा स्थापन के मानकों पर इनका वर्चस्व होता है,जिसमें ये खरे उतरते हैं। ये मानक आला बड़े दर्ज़े के अफसर भी पूर्ण नहीं कर पाते। यद्यपि कई बार आपको आला अफसरों में भी साहेब मिल सकते हैं और निम्न अफसरों में साहब।

अब साहब की कोई सीमित सीमाएं तो नहीं हैं कि साहब विशिष्ट जगहों पर ही मिलेंगे।ये साहब गलियों के नुक्कड़ों पर भारतीय अर्थव्यवस्था की कुरीतियों पर मंथन करते हुए, बाज़ारों की दुकानों पर चिंताग्रस्त होते..सार्वजनिक स्थानों पर अर्चन करते हुए ....कहीं भी नज़र आ सकते हैं बशर्ते आपकी नज़र कमज़ोर न हो।


गुलज़ार के अल्फाजों की मधुवर्षिणी ने उन्हें भी 'साहब' बना दिया लेकिन जिसका हृदय मानवीय संवेदनाओं की स्याह कलम से कागज़ पर दृष्टि चित्र बनाता रहे वो साहब नहीं हो सकता । ये लोगों की असीम मुहब्बत की पराकाष्ठा है कि वो साहेब से साहब बना दिये गए। ये साहब शब्द के विशिष्ट गुणों से रहित होने पर भी लोगों की धड़कनों के साहब हैं। इस प्रकार के उदाहरणों में साहब व साहेब का घालमेल सा है या कहें कि असल साहब की विवेचना ऐसे साहब से करना तर्कसंगत नहीं।साहिबा शब्द कभी लोकलुभावन नहीं बन सका जिसके बहुत से आयाम हो सकते हैं याने साहिबा की तुलना साहब से नहीं हो सकती और ये ज़िम्मा मेरे ही सर पर क्यों हो?

मुझे वाक़ई यदि अल्लाह या ईश्वर की दृष्टि प्राप्त होती , तो यकीनन इस धरती के तैरते भूखण्ड की पूर्ण जानकारी दिल व दिमाग़ में होती लेकिन इंसानी उम्र भी एक सज़ायाफ्ता सी है जो सबको अलग अलग मुकर्रर है। सभी इंसानी दिमाग़ , कुछ लोगों के परीक्षणों, अनुभवों, विचारों के आधार को मानकर बनाई गई किताबों से पढ़कर आधार बनाते रहे हैं और इन बने बनाये आधारों से जीवन में लोग बुद्धिजीवी भी कहलाते है। वरना दो से तीन पीढ़ीयों तक हुए संसूचन तक सीमित ये इंसान इतना तार्किक नहीं हो सकता। अंग्रेज़ भारत में आये और भारतीय संस्कृति में अपनी जड़ें छोड़ चले गए। हमने उनके शासन को तिरोहित कर दिया लेकिन ये जो दिल है उसने ये ग़ुलामी नहीं छोड़ी और ज़माना साहब लोगों से भरता गया। गाँधी जी ने देश के लिए जो भी काम किया हम उस दौर में उनकी बराबरी नहीं कर सकते। गाँधी जी के साथ देशव्यापी जनसमूह होने पर भी गाँधी जी , गाँधी साहब नहीं बन सके। 'सर' जैसे मानको को वो पहले ही छोड़ आये थे लेकिन इतना लोकप्रिय किरदार साहब क्यों नहीं बन सका?

कहीं ये साहब शब्द अंग्रेज़ी हुकूमत की रहनुमाई में तो नहीं पल रहा था। फिर गुलज़ार साहब और गाँधी जी की लोकप्रियता के मानक अलग अलग मानो में क्यों आकलित किये जायें। अंग्रेज़ी हुकूमत के बाद काफी जगह साहब शेष रहे। उस सूखी हुई साहब लता से कई हरित कलियाँ प्रस्फुटित हुई और साहबियत कि जमात कई गुना बढ़ गयी। इस स्वतंत्र हुए लोककल्याणकारी देश मे पहले नाम से साहब बन गए .... फिर नकलियत के लिबास को बदलते बदलते अपने आपको एक बार फिर से पराधीन कर दिया। एक दिमाग़ की सोंच आदमी को कभी कभी लिंकन, मंडेला, गाँधी बना देती है और कभी इंसानियत भी छीन लेती है। आप कौन साहब या साहेब हैं , वो नज़र साहबियत नहीं देख सकती।




4. हैदराबाद.....राजा और निज़ाम


                        हैदराबाद...निज़ामियत याद आ जाती है न? कभी निज़ाम का शहर हुआ करता था।आज किलेशाही के अवशेष अपने अस्तित्व को बयां कर रहे हैं। अब चूँकि हैदराबाद की निज़ामत मशहूर है तो गोलकोण्डा जैसे भव्य किले को देखना मजबूरी बन ही जाती है। दक्खिन के छोटे पठार तत्कालीन शासकों के सांस्कृतिक व कलात्मक रुझान के चलते खूबसूरत विश्व विरासतों में तब्दील हो गए। चाहे मुंबई की एलीफेंटा हों या औरंगाबाद की एलोरा.....चंदेल, पांडेय, चोल, पह्लव शासकों ने इन अद्भुत कृतियों के द्वारा अपने वंशजों के नामों को जीवंत किया है। चलिए वापिस निज़ाम के शहर लौटते हैं..गोलकोण्डा। गोल मतलब राउंड और कोंडा याने किला। ऐसा भी कहा जाता है कि किसी गड़रिये ने काकतीय राजा को इस पहाड़ी पर किला बनाने की सलाह दी थी इसीलिये ये 'गड़रिये की पहाड़ी' भी कहलाता है। सबसे साधारण अर्थ 'ऐसा किला जो गोल हो'।

शुरुवाती दौर में काकतीय राजाओं ने इस पहाड़ पर विशालकाय किले को निर्मित कर शासन किया। सन् १६६३ में इसी वंश के राजा कृष्णदेवराय ने, एक संधि के अनुसार 'गोलकोण्डा' किले को बहमनी वंश के राजा मोहम्मद शाह को दे दिया। बहमनी वंश की अलोकप्रियता को देखते हुए इन्ही के सूबेदारों में से एक कुतुबशाह ने अपनी सल्तनत कुतुबशाही को स्थापित कर दिया। काफी लंबे समय तक गोलकोण्डा का तख्त शासकों की मौजूदगी का साक्षी रहा। कितने ही घोड़ों की चापों में सैनिकों की सुरक्षा का घेरबन्द था और किले के दूसरी और जाता रास्ता , जिसमें पालकी द्वारा शासक जाते थे। पालकी ले जाने वाले लोगों में भी दो लंबे व दो बौने लोग होते थे ताकि पालकी का साम्य स्थिर रहे। कुतुबशाही राजाओं ने महल के कई हिस्सों के निर्माण करवाया और कहते हैं कुतुबशाही की रानी के लिए ही हैदराबाद शहर बसाया गया। कितनी खुशनसीब होती थी वो रानियां जिनके नाम से पूरा शहर ही बसा दिया जाता रहा होगा। आज तो कल्पना करना भी गुनाह हो जाएगा।ऊपर से संपत्ति पर आयकर विभाग की नज़र...खैर रानी को ही खुशनसीब कहा जा सकता है। खुशनसीबी व वैभव ज्यादा समय तक स्थायी नहीं रह करते। जब दक्खिन ऐश्वर्य में विलीन था तब औरंगज़ेब ने हैदराबाद और गोलकोण्डा पर आक्रमण कर दिया। शहर तहस नहस हो गया। गोलकोण्डा खून के आँसू रोने लगा।किले की दीवारें नेस्तनाबूत हो गईं और ऐसे में बादशाह ने मेलजोल को बढ़ावा देने हेतु औरंगजेब के बेटे मोहम्मद सुल्तान से अपनी बेटी की शादी की शर्त पर संधि कर ली किन्तु उसके बाद भी कुतुबशाही पर औरंगजेब ने दोबारा आक्रमण किया। अपनो के दगा के कारण कुतुबशाही का अंत हो गया। कुतुबशाही के अंत के बाद निज़ाम के तख्त हथिया लिया और नई व्यवस्थाओं ने जन्म लिया।

                                    किले के अंदर जाने पर कुछ महत्वपूर्ण विशाल संरचनाएं थी जिनकी छत पर हीरे की नक्काशी जैसी कारीगरी उकेरी गई हैं। यदि इस संरचना के मध्य में ताली बजाए या कोई भी आवाज़, जो महल में दूर तलक गूंज जाती थी। अंदर के कुछ कक्षों में तो दासियों की कानाफूसी सीधे राजकक्ष में सुनाई देने की व्यवस्था थी। कितनी अजीब बात है न...कि वो प्राकृतिक विज्ञान जो इतना रक्षात्मक था। आज नहीं दिखता। इस किले को बाहरी 7 घेरों से सुरक्षित किया गया होगा, जिसके अवशेष शहर के बीच बीच आकर अपने वजूद को पुख़्ता करते हैं।

किले के अंदर जाने पर दायीं और एक बंद बावड़ी जैसी संरचना थी, जिसमें मरणोपरांत बादशाह को सुवासित द्रव्यों से स्नान कराकर महल के दूसरे रास्ते से बाहर निकाला जाता था।किले के ऊपरी टीलों से 8 गुम्बदनुमा संरचनाएं अपने अंदर राजा के अवशेषों को शांति से सहेजे व्यक्त करती दिखती थी। गोलकोण्डा के ऊपरी भाग पर दुर्गा व काली का मंदिर स्थापित था। जब मैं ऊपर की और बढ़ी तो किले के नीचे से ऊपरी भाग पर जाने वाली सीढ़ियों पर स्थानिक महिलाएं टीका लगाती हुई मंदिर की और आगे बढ़ती जा रही थीं। अद्भुत संगम दिखा। हिन्दू व मुस्लिम समाज एक किले के अंदर पोषित होता रहा और एकता जीवंत रही , जिसे मैं ध्यान से देख रही थी । दूसरी और से नीचे उतरते वक़्त मेरी नज़र रानियों के सौंदर्य कक्ष पर पड़ी,जहाँ कभी आईने लगे होंगे, रानियों के अगिनत कक्षों के अवशेष अपने साथ हुए अत्याचार को दर्शा रहे थे।एक बड़ा प्रांगण जिसमें तारामती जैसी कलाकार नृत्य करती थी। राजा व रानी के बैठने के स्थान के पास एक शीशे को देखकर कोहिनूर मुस्कुराता था और इस तरह सारा रंगमहल रोशन होता रहा होगा। अलग से पड़े दो भण्डार कक्षों में  तत्कालीन हथियारों को रखा गया था। सब कुछ कितना व्यवस्थित था। पानी की आपूर्ति की व्यवस्था पूर्ण किले में जगह जगह पर अपनी सफल कार्यप्रणाली को सुना रही थी। वार्ता वहाँ पर मौन होती है जहाँ एक और आवाज़ का अभाव रहता है..फिर यहाँ तो मौन भी बहुत कुछ कहता था।

         कितनी पीढ़ियाँ बीत जाती हैं किन्तु संरचनाएं उन्हें याद रखती हैं और हम लोग संरचनाओं को देखते हैं लेकिन जो लोग इन संरचनाओं को जीते हैं उनका हृदय इन खंडहरों के विलाप को ज़रूर सुन पाता होगा,जो बरसों से किसी अपने के मिलने की आस में आज भी खड़े हैं।

हम कितनी यात्राएं करते हैं,जीवन भी एक यात्रा है। साथियों का कारवां हो तो यात्राएं सफल हो जाती हैं। इतिहास जब सामने खड़ा होकर अपनी पहचान बताता है ,तो सभी को उससे सीखना चाहिए। पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर इतिहास का बदला अब लेने की कामना करना कहाँ तक सही है? आज के कृत्य भी कल का इतिहास बनेंगे। भारत देश की विभिन्नता से ही देश की मौलिकता है और  भारत अलग अलग परिधानों से सजा अच्छा लगता है । बस भारत को अलंकृत करने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है।